Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verses 7–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 189, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
आतिवाहिकदेहस्य चिरस्यानुभवोदये ।
आधिभौतिकताबुद्धिरुदेति मृगवारिवत् ॥ ७ ॥
जगत्स्वप्नभ्रमाभासं मृगतृष्णाम्बुवत्स्थितम् ।
असदेवेदमाभाति सत्यप्रत्ययकार्यपि ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
वह जीव प्रौढ संकल्पराशि से पुर्यष्टक
(संकल्पादिभिः पूर्यन्ते इति पुर्यस्तासाम् अष्टकम् यानी संकल्प आदि से जो पूर्ण की जाती हैं वे पुरियाँ
है, उनका अष्टक यानी आठ पुरियाँ इस व्युत्पत्ति से) कहा गया है । सृष्टि के आदि काल में प्रस्तुत होने
के प्रथम होने के कारण वह प्रकृति कहा गया है, तत्त्वदर्शन से औपाधिकरूप से अविद्यमान होने के
कारण विद्वानों द्वारा “अविद्या' कहा जाता है । चिदाभासरूप जीव के इत्यादि अनेक नाम मैंने आप से
कहे है