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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

जीवश्चिद्धनरूपत्वादहमित्येव चेतनात् । देशकालक्रियाद्रव्यशक्तीर्निर्माय तिष्ठति ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

अब जीव किस-किस तरह के आकारें को ग्रहण करता है, इसको बतलाने के लिए सबसे पहले अनेक प्रकार की शक्यो से सम्पन्न होकर उत्यन्न हुए तथा समस्त कल्पनाओं के मूलस्तम्भस्वरूप समष्टि अहंकार के अध्यास का दिग्दर्शन कराते हैं / जो समष्टिजीव है, वह असल में चैतन्यघन का ही स्वरूपभूत है ओर "अहम्‌" रूप से स्फुरित होता है, इसी से देश, काल, क्रिया और द्रव्य की असीम शक्ति का निर्माण (आविर्भाव) कर वह अवस्थित रहता है