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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, Verses 7–12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 190, verses 7–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 190 · श्लोक 7-12

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । बोधमात्रं भवेज्ज्ञानं भावसाधनमात्रकम् । न ज्ञानज्ञेययोर्भेदः पवनस्पन्दयोरिव ॥ ७ ॥ श्रीराम उवाच । एवं चेत्तत्कथमयं ज्ञानज्ञेयादिविभ्रमः । सिद्धः शशविषाणाभो भविष्यद्भूतभव्यशः ॥ ८ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । बाह्यार्थभ्रान्तितो ज्ञेया भ्रमबुद्धिरिहोदिता । बाह्यश्चाभ्यन्तरश्चार्थो न संभवति कश्चन ॥ ९ ॥ श्रीराम उवाच । योऽयं प्रत्यक्षदृश्योऽर्थो मुने त्वमहमादिकः । भूतादिरनुभूतात्मा स कथं नास्ति मे वद ॥ १० ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । आदिसर्गविधावेव विराडात्मादिकोऽनघ । जातो न कश्चिदेवार्थो ज्ञेयस्यातो न संभवः ॥ ११ ॥ श्रीराम उवाच । भविष्यद्भूतभव्यस्था जगद्दृष्टिरियं मुने । नित्यानुभूयमानापि न जातेति किमुच्यते ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

आतिवाहिक शरीर आधिभौतिक रूप से भावित होकर पृथिवी, शरीर आदिरूप पिंडाकार को देखता हे । चिदाकाश मैं ब्रह्म हूँ" यह यथार्थ चेतना छोड़कर "यह मनुष्य आदि शरीर मैं हू, यह पृथिवी आदि मेरा आधार है", यों देखता है और उसमें वैसी ही आस्था करता है