Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 30
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, वचनो के अगोचर, चेत्य ओर चलनादि क्रियाशून्य सदा स्वप्रकाश,
नित्यमुक्त, निर्विकार ब्रह्म में भ्रम ही किसको, किस निमित्त से तथा किस तरह का हो सकता है ?
इस विषय में मुझे उत्तर दीजिये । अद्वितीय ब्रह्म द्रैतलेश का भी सहन नहीं कर सकता है, यह प्रश्न
का भाव है