Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
कथं तपत्यहोऽदिक्कं सर्गस्यादौ परत्र च ।
कथं भित्त्या विना भाति वद दीपप्रभा मुने ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, सम्यक् ज्ञानमय कैवल्यरूप बोध क्या कहलाता है ? जिस बोध से
यह जीव बंधन से पूर्णतया विमुक्त हो जाता हे । शंका का भाव यह है कि अनेक विशेषताओं से युक्त रत्न
आदि की कुछ विशेषताओं का ज्ञान होने पर भी अन्य विशेषता ओं के ज्ञान के लिए पर्यालोचन जन्य सम्यक्
ज्ञान दूसरा हो, किन्तु ब्रह्मरूप निर्विशेष वस्तु में आपात ज्ञान की अपेक्षा सम्यकृज्ञान दूसरा क्या होगा
जिससे कि जीव के बन्धन की निवृत्ति होगी यह श्रीरामचन्द्रजी की शंका का तात्पर्यार्थ हे