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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 47

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, यदि ऐसी स्थिति ही तत्त्व है तो 'द्वैतैक्यासंभवे ब्रह्मन्‌ कारणासंभवे सति ।* यों आपने द्वित्व आदि की प्रसक्ति से जिस अद्वैतहानिरूप दोष का उद्घाटन किया वह कैसे होगा ओर क्या होगा ? इसलिए ऐसा मानना ठीक नहीं है । इस कारण आप शुद्ध अद्वैत का ही अवलम्बन कीजिए