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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 58

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : गुरुवर, तदुपरान्त वासनाओं के सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने पर स्वप्नतुल्य जगत्स्थितिवाले जिस पुरुष की दृष्टि में जगत्‌ के पदार्थो की स्थूलता विनष्ट हो चुकी उस जीवन्मुक्त का फिर क्या होता है ?