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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 82

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 82 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 82

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, इस प्रकार से आपसे बोधित हुआ मैं जाग्रत्‌ जगत्‌ भी स्वप्न जगत्स्वरूप ही भासित होता है यों जान गया हूँ स्वप्नवत्‌ ज्ञात हुआ भी यह जगद्रूपी पिशाच क्रूर ग्रह की तरह मुझे दुःख देता हे अतः किस तरह उसकी चिकित्सा की जाय यानी निवृत्ति की जाय ?