Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 85
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 85 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 85
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हिन्दी अर्थ
हे महामते श्रीरामजी, चेत्य के उन्मुख चित् ही चित्त है यह बात मैं पीछे अनेक बार कह
चुका हूँ। ऐसी स्थिति में चित्त महाचिद्घन ही है और वही जगत् के आकार की तरह स्थित है यह सिद्ध
हुआ | अतएव स्वप्न , जाग्रत् आदि कुछ भी ब्रह्म से भिन्न नहीं हे