Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 41

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

क्यो उपपन्न नहीं होती ? इस प्रश्न पर कहते हैँ । क्योकि यह सर्गरूप स्वप्न अपूर्वं (पहले अननुभूत) ही चक्षु आदि प्रमाणो से अनुभूत होता है किन्तु स्वप्न जाग्रत्‌काल में अनुभूत अर्थवाला संस्कार मात्र से भासमानार्थ है यानी जगत्‌ में खूब अभ्यस्त अर्थ ही स्वप्न में दिखाई देता है ऐसा लोक में सर्वजग प्रसिद्ध हे