Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 43
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हिन्दी अर्थ
वार्वाक के आक्षेप का समाधान करते हैं।
जिसका स्थूल शरीर नहीं होता उसका स्वप्न देखने में नहीं आता है अतः अशरीर प्रत्यगात्मा में
तीन अवस्थारूप स्वप्न का आरोप है यह उक्ति उचित नहीं है, यह चार्वाकों का कथन भी ठीक नहीं
है,क्योकि पिशाच आदि स्थूल शरीर रहित होते हैं और उनकी स्वप्नवत् स्थिति रहती है