Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 197, Verses 12–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 197, verses 12–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 197 · श्लोक 12-18
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
कहीं पर चिरकाल से दुर्भाग्य में पड़े हुए बहँगी (काँवर) ढोनेवाले कीरक (कीरक
देश के) लोग थे । वे जसे ग्रीष्म से पुराने वृक्ष सूख जाते हैं वैसे ही दुःख से शेष को (कृशता को) प्राप्त
हुए । चिथड़ों की कन्था से ओढनी बनवानेवाले दुरन्त दारिद्रय ने वैसे ही उनका मुंह ओर अन्तःकरण
दीन-हीन बना दिया जैसे कि बाँध टूट जाने से निकल गये जल से कमल निष्प्रभ हो जाते हैँ । दारिद्रय
से अत्यन्त सन्तप्त हुए उन लोगों ने आजीविका के लिए विचार किया कि हम लोग किस युक्ति से अपने
उदर की पूर्तिं करें | ऐसा विचार कर प्रतिदिन दिनभर के परिश्रम से साध्य लकड़ी के बोझ के विक्रय
कार्य से हम अपनी आजीविका करेगे, यों उन्होने निश्चय किया । ऐसा निश्चय कर वे लकड़ियाँ काटने
के लिए जंगल में गये । जिस वृत्ति से आजीविका चलती हे वही वृत्ति आपत्ति मेँ विराजती है । उस दिन
की कमाई को उसी दिन खानेवाले वे प्रतिदिन जंगल मेँ जाकर, लकड़ियाँ लाकर और उन्हे बेचकर
अपना जीवन निर्वाह करते थे। जिस वनप्रान्त में वे जाते थे उसमें गुप्त और अगुप्त सम्पूर्ण रत्न, सुवर्ण
ओर लकड़ियाँ थीं