Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 198, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 198 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
यद्यपि शास्त्र मे मुख्यवृत्ति से (अभिधा से) ब्रह्म-बोधन की सामर्थ्य नहीं है तथापि लक्षणा आदि
उपायो से बोधन में सामर्थ्य है ही, इसलिए उससे अधिकारी लोगो को ब्रह्मज्ञान होता ही है अतः शास्त्र
व्यर्थ नहीं है, ऐसा कहते हैं।
जैसे स्त्रीरत्न में मणि, दर्पण, चन्द्रमा आदि सबकी सुन्दरता को मात करनेवाला निर्मल लावण्य
रहता है वैसे ही सकल दृश्यवर्ग अथवा त्रिवर्ग को मातकर सर्वोत्कृष्ट रूप से स्थित निर्मल ब्रह्मबोध
शास्त्र में विद्यमान है