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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 199, Verse 39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 199, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 199 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

यद्यपि धर्मव्याध मृगवध, मांसकर्तन आदि क्रूर व्यवहार में परायण था फिर भी समदृष्टि होने के कारण वह अपना पांचभौतिक शरीर त्यागकर परम पद को सिधारा। कपर्दन नाम का राजर्षि पुरुष होने के कारण अप्सराओं के संभोग में समर्थ था और अप्सराएँ भी उस पर प्रेम करती थीं परमोद्दीपक नन्दनवन में वह रहता था फिर भी वह समदृष्टि वश सुस्त्रियों में मोहित नहीं हुआ॥ ३७, ३ ८॥ वह राजर्षि कपर्दन सम चित्तवाला होने के कारण विस्तृत राज्य को तिलांजलि देकर विन्ध्याचल के दुर्गम जलप्राय प्रदेशों में तथा करीर के वनों में निश्चेष्ट होकर चिरकाल तक रहा