Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स्ववार्धकशरच्छान्तशीर्णेहापर्णसंततेः ।
जगज्जंगलजातस्य कलत्रोपतृणावलेः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी
वृद्धावस्थारूपी शिशिर ऋतु के अन्त में इसके चेष्टारूप पत्तों के समूह शान्त और शीर्णं हो
जाते हे । जगत्-रूपी जंगल में उत्पन्न हुए इस वृक्ष के समीप में सत्री, पुत्र आदि पोष्यवर्गरूपी
बहुत-से तृण पैदा हुए हैं