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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

स्थिरास्थिग्रन्थिनद्धानि पङ्कमग्नात्मकानि च । वासनारसपीतानि निजरक्तरसानि च ॥ २० ॥ गुल्फवन्ति दृढाङ्गानि सुत्वञ्चि मसृणानि च । तेषामपि च मूलानि विद्धि बुद्धीन्द्रियाणि हि ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे भगवान्‌, दृढ़ हड्डियों की गाँठों से बंधी, नाड़ियों में भरे गये अन्नरसों में डूबी हुई, वासनारूपी रस को पी जानेवाली तथा अपने रक्तरूप रस से परिपूर्ण; एड़ी के ऊपर की गाँठ से युक्त, दृढ़ अंगोंवाली, सुन्दर त्वचाओं से समन्वित और चिकनी उन कर्मेन्द्रियों के भी मूल आप ज्ञानेन्द्रियों को जानिये