Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
अचेतनाकाशमनन्यदेकं तदेवमस्ति त्विदमर्थहीनम् ।
तद्व्योमरूपं यत एतदेवं निरामयं चेतनसारमाहुः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, चूँकि चिति के अभाव से रहित, सजातीय और विजातीय भेदों से शून्य, दृश्य
पदार्थो से हीन जो एक आकाश है वह तत्त्वदृष्टि से ब्रह्मरूप ही है । इसलिए ब्रह्मज्ञानी लोग उसी
को हम सब चेतनो का सार (पारमार्थिक रूप ) कहते हैं