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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 20, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

जीवो जीवत्वमेव स्वजीवत्वादेव च स्वतः । अन्तस्त्वेन वहिष्ट्वेन दृश्यते न च वायुवत् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि स्वशब्द का अर्थ उपाधि से युक्त आत्मा मान लिया जाय, तो भी यह स्वशब्दार्थ से परथक्‌ भावशब्दार्थ नहीं पा सकता, जिससे कि स्वशब्दार्थ से भावथब्दार्थ में कोड विशेष बात आ जाय, यह कहते हैं। उपाधि से युक्त जीव भी स्वयं उपहित-स्वरूप ही है, क्योंकि उसमें जीवत्वरूप उपहितरूपता ही विराजमान है अतः उपहितरूप को छोड़कर और कोई दूसरारूप, जो कि भावशब्द का अर्थभूत तथा स्वविशेष्यता के लिए योग्यता रखता हो, भीतर या बाहर यहाँ दृष्टिगोचर नहीं होता । यही रूप- जैसे “वायु बहती है" यहाँ पर क्रियारूप ही वायु का विकल्पवृत्ति से भेद मानकर “बहती है” कहा जाता है वैसे ही “जीवो जीवत्वम्‌" आदि द्वारा - धर्मधर्मिभावरूप भेद मानकर कहा जाता है