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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 20, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

यादृगेव विराडात्मन्येष विस्तार आगतः । तादृगेवेह सर्वस्मिन्नणुमात्रेऽपि भूतके ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे विराट्‌ आत्मा में इस समस्त जगत्‌ का विस्तार कल्पनावश हुआ है, वैसे ही सभी इन मच्छर आदि सूक्ष्म भूतों मेँ जगत्‌ का विस्तार हुआ है