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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verses 32–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 200, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

तथाप्यात्मक्रमं ब्रह्मन्निमं नेतुमवन्ध्यताम् । अहं वच्मि यथाप्राप्तं न कोपं कर्तुमर्हसि ॥ ३२ ॥ आत्मना सकलत्रेण लोकद्वयशुभेन च । राज्येनाखिलभृत्येन भवन्तं पूजयाम्यहम् ॥ ३३ ॥ एतत्सर्वं तव विभो स्वायत्तं स्व इवाश्रमः । नियोजय यथादेशं यथाभिमतयेच्छया ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

संसार से छुटाकारा पाने का एकमात्र हेतु तत्त्वज्ञानरूप स्वभाव यथार्थरूप से स्थित है । उक्त स्वभाव मनकी आत्यन्तिक अनासक्ति से लभ्य है जिसका मन आसक्ति रहित है वह निश्चय भवसागर से पार हो चुका