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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 53–54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 201, verses 53–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 53,54

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सभ्य लोगों ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, एकमात्र परमार्थ तत्त्व से सुशोभित होनेवाले श्रीवसिष्ठजी के वचन में कोई अनुचित या दुष्ट अर्थ होता है यह बात आज एकदम नई सुनने में आई है, क्योंकि आज तक इस तरह की बात जगत्‌ में कहीं भी दृष्ट या श्रुत नहीं हे । हम लोगों का अनन्त जन्मदोषों से जो पाप संचित था उसका आपने वैसे ही परिमार्जन किया है जैसे कि सुवर्ण के मल का अग्नि परिमार्जन करती है