Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 57–58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 201, verses 57–58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 57,58
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे मुने, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी से यह कहकर मेघ के सदृश गम्भीर शब्द से
एक साथ पुनः पुनः नमस्ते कहते हुए उन मुनिजनों ने आकाश से सिद्धो के साथ स्वयं भी वषयि गये
पुष्पांजलिसमूहों से वसिष्ठजी को पुनः पुनः वैसे ही आच्छन्न कर दिया जैसे कि मेघ हिमवृष्टि से
हिमालय को आच्छन्न करते हैं