Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, Verses 14–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 202, verses 14–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 202 · श्लोक 14-21
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हिन्दी अर्थ
हे मुनिवर, परम
शान्ति को प्राप्त हुए मेरे मन के सकल विषयस्मरण शान्त हो चुके हैं, उसका विषयभोग का कोतुक चला
गया है तथा उसने विषय संकल्पो का त्याग कर दिया है । मेँ जगत् के विषय में मानसिक विषयालोचन
रहित जिसमें फिर बोध नहीं हे ऐसा रेन्द्रिक विषयालोचन रहित निरामय होकर सोता सा हूँ, पूर्णरूप से
निर्वाण को प्राप्त हूँ, शान्त हूँ । यहाँ पर इव शब्द सुषुप्तभान के भी मिथ्या होने से तुरीयावस्था मेँ
अवस्थिति का द्योतक है । पूर्वं की आशाओं से विह्ललित शरीर में आत्मबुद्धि से स्थिति का उपहासकर
देदीप्यमान (फड़क रही) आपकी सूक्तियों से इस समय स्वस्थ होकर निस्सन्देह स्थित हू । न उपदेश
से, न उपदेशप्रयुक्त अन्य प्रयोजन से, न शास्त्रों से, न बन्धु-बान्धवों से और न इन सबके त्याग से ही
मेरा कोई प्रयोजन हे । जिसमें केवल प्रत्यगात्ममात्र में चित्त प्रतिष्ठत रहता है ऐसी अविनाशिनी (नित्य)
जीवन्मुक्त स्थिति का मैं स्वर्ग में साम्राज्य की असुरादि के क्षोभ से वर्जित जो स्थिति है उसके तुल्य ही
अनुभव करता हूँ। मैं बाह्य दृष्टि से जिसमें नेत्र आदि अंग हैं ऐसी स्थिति को प्राप्त होकर भी जगत् को
आकाश से भी अत्यंत निर्मल एकमात्र चिन्मात्राकाशरूप ही देखता ह । अज्ञानी पुरुष की तरह जगत् को
जड नहीं देखता | यह जगत् केवल आकाशमात्र ही है ऐसा दृढ़ निश्चयवाला मैं इस जगत् के मोह-निद्रा
के साथ बाधित होने पर अक्षय स्वरूप हो सदा ही जागता हू । भावी कार्य को यथाकाम, वर्तमान कार्य
का यथाप्राप्त तथा पूर्वस्थित कार्य को यथास्थित जो आप कहते हैं उसको मैं फलाभिसन्धि से शून्य
होकर अविघ्नतया गुरु तथा शास्त्र के अनुसार करता हूँ। “यथाकामं यथारम्भं यथाप्राप्तं यथास्थितम्
इस तरह के पाठान्तर में अपने कार्य के विषय मेँ यथाकाम (यथेच्छ) तथा प्रारब्धानुसार' पर के कार्य के
विषय में यथाप्राप्त तथा यथास्थित जो आप कहते हैं उसका मेँ गुरु और शास्त्र के अनुसार निर्विघ्न
सम्पादन करता हू