Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, Verses 28–29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 202, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 202 · श्लोक 28,29
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हिन्दी अर्थ
तो आप आगे कैसे ओर किस तरह व्यवहार करेगे ? इस प्रश्न पर कहते हैं।
जैसे ही प्रबुद्ध तथा अप्रबुद्ध सब राजा विविध कामधामवाले राज्यों में व्यवहार करते हैं वैसे ही हर्ष,
विषाद ओर आशा से विरहित, स्थिर, एक, सम दर्शन मैं आत्मा में स्थित होकर निःशंक हो व्यवहार
करता हूँ। अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध में यही अन्तर है कि अज्ञानी हर्ष, विषाद ओर आशापाश से बद्ध, अस्थिर
तथा विषमदुष्टि रहता है, ज्ञानी हर्षादि से रहित स्थित तथा समदृष्टि रहता हे ॥२६.२७॥
हे प्रभो, सकलविषयैश्वायनिन्द के ऊपर स्थित ब्रह्मानन्द से मैं सुखी हूँ अतएव अपने शरीर में
विषयसुख की मुझे इच्छा नहीं है । बाह्य दृष्टि से सर्वसाधारण जनकी तरह मैं स्थित हू । मुञ्चे अपनी
इच्छा के अनुसार सेवा आदि जिस किसी भी विषय मेँ नियोजित कीजिये । हे सज्जन शिरोमणे, एकमात्र
निर्मलब्रह्मरूपलक्ष्य में दुष्टिवाला मेँ जव तक मेरा शरीर रहेगा तव तक सांसारिक स्थिति का निःशंक
होकर वैसे ही पालन करूँगा जैसे कि बालक अपनी अवस्था के अनुरूप क्रीडा का अनुवर्तन करता
हे