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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verses 22–25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 206, verses 22–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 22-25

संस्कृत श्लोक

रूढानामप्यरूढानां किं प्रयोजनमुच्यताम् । असदासीज्जगत्पूर्वं सत्संपन्नमनन्तरम् ॥ २२ ॥ इति श्रुतेः कथं ब्रह्मन्कथ्यतां संगतार्थता । अयं भवेत्कथं ब्रह्मा भवेच्चेत्तन्महामुने ॥ २३ ॥ एवंप्रभावान्नभसः किं सर्वस्मान्न जायते । ओषधीनामथार्थानां सर्वेषां वा स्थितिं गताः ॥ २४ ॥ कथं स्वभावाः कथय यथाबोधं मुनीश्वर । एकस्य जीवितं पुंसः सुहृदा मरणं द्विषा ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म कभी साकार नहीं हुआ, न उसका कालिक परिच्छेद ही है किन्तु अज्ञानी जीव जव तक अज्ञान रहता है तब तक सुप्त पुरुष की तरह अपने आत्मा को जगत्‌ के आकार में देखता है, इस आशय से कहते हैं। यह अविनाशी ब्रह्म आदि-अन्त शून्य नित्य हे । परमाकाश में न आदित्व, न मध्यत्व और अन्तत्व है तथा न विविध आकार हैं। यह ब्रह्माकाश आदि-अन्त रहित, अक्षर सर्वव्यापी हे, अतएव ब्रह्माकाशमय आदि-अन्त विहीन यह विश्व चारों ओर फैला है । इस परम चिदाकाश का स्वतः स्वात्मामे जो भान है, उसको उसी ने स्वयं विश्व कहा है, वह मिथ्या है । जैसे पुरुष का स्वप्ननगरदर्शन है वैसे ही नगरवत्‌ उसका यह भान है वही विश्व कहलाता हे