Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
किल देशान्तरे नित्यमथ लोकान्तरेऽपि च ।
निरावृतो य एकात्मा स किं नाम न चेतति ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तुम्हारा स्वप्ननगर
विस्तृत होता है वैसे ही हिरण्यगर्भ के वेष धारण किये हुए परमब्रह्म का स्वप्ननगर यह जगद्-भान
विस्तृत है