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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

न कदाचन यात्यस्तमुदेति न कदाचन । ब्रह्म ब्रह्मचिदाभानं सर्वदात्मन्यवस्थितम् ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

वैसे ही जगत्‌ मेँ भी चिन्मयता की संभावना करनी चाहिये, ऐसा कहते है। ब्रह्म संविदाकाशमय है, उसका संकल्पनगर विराट्‌ है, ब्रह्मा भी एकमात्र संवित्‌मय ही है वैसा ही उसका बनाया हुआ यह जगत्‌ भी शुद्ध संवित्‌मय ही कहा जाता है