Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
यद्यत्संकल्पनगरे यदा संकल्प्यते यथा ।
तथानुभूयते तत्तत्तादृग्विरचनं तदा ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
है उस विषय का वह रूप अवश्य होता ही हे । वह सत् हो अथवा असत् हो इस विषय में आग्रह
नहीं है