Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 209, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
इत्येवमादिपापानां पुण्यानां च फलं महत् ।
ब्रह्मसंकल्पकचितं यथा यद्यत्तथैव तत् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रकृत में प्रजाजन विधि-निषेध शास्त्रों द्वारा बोधित धर्म ओर अधर्म में से एक
आस्थावश जो धर्म अथवा अधर्म का फल प्राप्त करते हैं वह भी ब्रह्म के ही इस प्रकार के संकल्पवश ही
होता है