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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

एतत्ते कथितं सर्वं यथापृष्टं महीपते । जगदप्रतिघं सर्वमिदं चिन्मात्रकल्पनम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके सब बन्धुबान्धव भी उसको वैसे ही अमर देखते हैं इस तरह जीवन ओर मरण दोनों उसको एक साथ प्राप्त होते हैं