Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
परिज्ञातं चिदाकाशमपरिज्ञातपादपे ।
सोऽहं त्रिजगदित्येव बन्धमोक्षविनिर्णयः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म के संकल्प में जैसे जगत् का भान हुआ वैसे ही वह प्रलयपर्यन्त स्थित रहा । फिर प्रलय के बाद अन्य
संकल्प के रूप से अन्य ब्रह्मांड प्राप्त होगा ॥३ ६॥ जैसे स्वप्न में स्वप्ननगर का भान होता है वैसे ही
कल्प कल्प में चितिरूप चितिस्वप्न में संकल्परूप जगत् का प्रत्येक जीव के प्रति भान होता हे