Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verses 15–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verses 15–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
न भात्येवासंविदितमस्ति नास्ति न चोद्यता ।
शून्यं ह्यप्रतिघं चैतत्पराकाशमरोधकम् ॥ १५ ॥
चित्स्वभावतया भातं भारूपमिव दृश्यते ।
अस्मिंश्चिदभिमानश्च विद्यते न स्वभावतः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस लोक में अनुष्ठित (किये गये) दान से परलोक मेँ
चित्प्रतिभासस्वरूप तत्-तत् फल प्राप्त होता हे । उसको संकल्पस्वरूप जीव प्राप्त करता है, ऐसा
विद्वान् जन कहते हैँ फिर वह (फल) परलोक में क्यों न मिले इस कल्पनामय संसार में अनुष्ठित
दान से पूर्वोक्त अकृत्रिम संकल्प ही परलोक में चारों ओर चिन्मात्ररूप भोग, एश्वर्य आदि दान-फल
हो अथवा अदान से दरिद्रता आदि अदान का फल हो इसमें कोई विरोध नहीं है, यों सब असमंजसों
का परिहार हो गया, यह अर्थ हे