Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 212, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 30
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हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, सिद्ध लोकों को भोग आदि का
फल मेरे द्वारा वर्णित रीति से ही कल्पनामात्र हो अथवा अन्य मुनिया द्वारा वर्णित प्रकार से अन्य प्रकार
का ही हो अथवा नहीं ही हो तथापि जीवन्मुक्ति को प्राप्त हुए आपका उनके विषय में कोन आदर है ?
सिद्धि आदिरूप तुच्छ फल में आप पुरुषार्थबुद्धि का त्याग कीजिए । क्योकि आपको ब्रह्मतत्त्व का ज्ञान
हो चुका है । अतः आपको केवलमात्र मायारूपवाले सिद्ध लोकों के वैभव को जानने के लिए वृथा
परिश्रम नहीं करना चाहिये