Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 213, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
शाम्यतीदमशेषेण तथा सर्वत्र सर्वदा ।
यथा जाग्रद्विधौ स्वप्नः स्वप्ने वा जागरो यथा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, बद्ध की दृष्टि से ब्रह्म सदा त्रिभुवन-
सा ही भासता है मुक्त की दृष्टि से यह सब शान्त ब्रह्म ही है उसके अतिरिक्त भेद तनिक भी नहीं
है