Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 213, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
यथायं त्वं सितोदान्तरेक एवादितः कचैः ।
तथा ब्रह्मैवमच्छात्म सर्गे सर्गक्षयेऽक्षयम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस
परमपद में अहंकार का स्फुरण होने पर उसमें आकाश का अध्यास होता है पुनः दिशाओं का अध्यास,
काल का अध्यास तथा त्रिविध परिच्छेद का (तथा वस्तुकृत परिच्छेद का) अध्यास होता है