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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

उपायस्तु तथा तेन दृष्टिर्वास्तीह कीदृशी । अहो नु वितता भूमिः कष्टमेतादृशी दशा ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

गुरु ने कहा : वत्स जो यह जगत्‌ प्रतीत होता है वह जैसे शुक्ति (सीप) अपनी चमक-दमक से रजत की (चाँदी की) तरह स्फुरित होती हे वैसे ही चिदाकाश का अतिशय स्फुरण ही हे उससे अतिरिक्त जगत्‌ कुछ नहीं हे