Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
कल्पान्तकालकपिकम्पितशुष्कशाखात्स्वर्गद्रुमात्पतितमाशु विडम्बयन्ती ।
तारागणं प्रथितभासमनल्पहासमाशामुखप्रसृतभैरवमम्बरस्था ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वत्स श्रीरामचन्द्रजी, वहाँ पर भी मैं गुरु
था ओर आप शिष्य थे । मेरे सामने बैठकर उदारबुद्धिवाले होते हुए भी अबुद्धि की तरह आपने मुझसे
यह पूछा था