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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 215, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 18

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अहा ! असीम विश्रान्तिसुख भूमि मुझे मिल गई है । जन्म, मरण आदि अनन्त अनर्थो से व्याप्त संसारदशा प्राणियों को अत्यन्त क्लेशदायक है