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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 215, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 25

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

देवर्षि श्रीनारदजी ने कहा : अहा ! जो उत्तम तत्त्व ब्रह्मलोक में सुनने को नहीं मिला, जो स्वर्ग में नहीं मिला तथा अन्यत्र भूतल में भी जो नहीं मिला उस उत्तम तत्त्वज्ञान को सुनकर मेरे कान आज परम पवित्र हो गये हैँ