Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 216, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
मम नास्ति कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
यथाप्राप्तेन तिष्ठामि ह्यकर्मणि क आग्रहः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस ग्रन्थ का ऐसा महाफल आपको कहाँ से ज्ञात हुआ ऐसी किसी को आशंका हो, तो इस पर
कहते हैं।
पुराने समय में अचिन्त्यरूपी ब्रह्मा ने मेरे द्वारा विरचित इस मोक्षमयी संहिता को मुनियों की सभा
में आद्योपान्त स्वयं देखकर यह वचन सबके प्रति कहा कि सत्यवक्ता वाल्मीकिजी, वसिष्ठजी तथा मेरे
वचन असत्य कदापि नहीं हो सकते तथा पूर्व रामायण में मुझे उन्होने वरदान दिया था कि नते
वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति" यानी इस काव्य में तुम्हारी वाणी तनिक भी असत्य न होगी