Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 216, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

न श्रुतं पूर्वमेवैतज्प्तानसारं श्रुतं मया । तेनैव मुदितश्चान्तः पीतामृत इवाधुना ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे साघो, जैसे श्रीवसिष्ठजी के उपदेशवचनों के हृदय में प्रसार से सकल सन्देहो के साथ अज्ञान का विनाश होने के कारण महानुभाव राम आदि रघुवंशी परम पवित्रतम जीवन्मुक्तिपद को प्राप्त होकर शोकविहीन हो गये वैसे ही तुम्हें भी नित्यसिद्ध ब्रह्मस्वरूप जीवन्मुक्तपद को प्राप्त होना चाहिये तथा शोकरहित होना चाहिये