Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 216, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अप्सरा उवाच ।
नमोऽस्तु ते महाभाग देवदूत त्वया मम ।
श्रावितादर्थविज्ञानात्परां निर्वृतिमागता ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
तृष्णारूपी चमड़े की रस्सी से कसकर बँधी हुई अज्ञानी के हृदय में जमी हुई देह, इन्द्रिय
आदिमे तादात्म्यअध्यासरूप ग्रन्थियाँ, गृह, पुत्र, कलत्र आदि में ममताग्रहरूप ग्रन्थर्यो तथा सब प्राणियों
में एकात्मता के अनुभव से अभेद (एेकरस्य) न होने के कारण द्वेष आदि की हेतुभूत ग्रन्थर्यो ये सबकी
सब ग्रन्थियाँ इस मोक्षशास्त्र कथाओं के विचारविमर्शं से जैसे बाल (नवोढा) स्तर्यो पहले बाल्यावस्थावश
खेलकूद में चित्त रहने तथा रसानभिज्ञ होने के कारण पति के विषय में विशेष दिलचस्पी नहीं रखतीं
लेकिन समय पाकर प्रौढ होने पर पति के साथ हिलमिल जाती हैं वैसे ही सब भूतों मे अभेद को (एेकरस्य
को) प्राप्त हो जाती हैं