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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

जगतोऽन्तरहंरूपमहंरूपान्तरे जगत् । स्थितमन्योन्यवलितं कदलीदलपीठवत् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

ङी रीति से पूर्वोक्त अहंकार और जयत्‌-ये दोनों एक-दूसरे के अन्दर स्थित हैं; यह समझ लेना चाहिए, यह कहते हैं / इसी रीति से जगत्‌ के अन्तर्गत अहंकार और अहंकार के अन्तर्गत जगत्‌ ये दोनों परस्पर एक दूसरे में, केले के पत्तों के स्तर के समान, वेष्टित हैं