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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

अन्तःशीतलतेहासु प्राज्ञैर्यस्यावलोक्यते । अकृत्रिमैकशान्तस्य स ज्ञानीत्यभिधीयते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वाभाविक एकमात्र स्वात्मलाभ से युक्त जिस पुरुष की व्यवहारो मेँ भीतर से शीतलता बुद्धिमानों द्वारा अनुभूत होती है वह ज्ञानी कहा जाता है