Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
संविन्मात्रं हि पुरुषः सर्वगोऽपि स तिष्ठति ।
स्फुटसारे शरीरस्य यथा गन्धोऽब्जकेसरे ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, सर्वत्र व्याप्त भी संविन्मात्र वह पुरुष शरीर के स्फुटसार में (वीर्य
में) इस तरह अवस्थित रहता है, जिस तरह पद्मकोश में गन्ध