Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
मागा विषादं पन्थानमागतोऽसि मनीषिणाम् ।
प्रायः प्राप्तोसि संसारसागरस्य परं तटम् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे महाबुद्धे, मैं ब्रह्मलोकवासी वसिष्ठमुनि हूँ | राजर्षिं अज के
याजनादिरूप किसी काम से आ रहा मैं इस मार्ग में उपस्थित हूँ ॥३ ८॥ हे पथिक, विषाद मत करो,
तुम मनीषियों के रास्ते पर अव आ गये हो, लगभग तुम संसारसागर के दूसरे किनारे लग चुके हो