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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verse 16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 24, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

सकण्टकममेध्यस्थं श्लेष्मातकमिव द्रुमम् । असदेव महारम्भं चलदर्जुनवातवत् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

इसमें दृष्टान्त देते हैं / कण्टकयुक्त, अपवित्र स्थान में रहनेवाला भीलावा के वृक्ष के समान असत्‌ होने पर भी बड़े - बड़े कर्मों का आरम्भ करनेवाला, अर्जुनवात के समान सदा ही भ्रमणकारी मेरा यह मन मेरे अनेक बार मर जाने पर भी मरण को प्राप्त नहीं हुआ यानी इच्छितार्थ शून्य हो एकमात्र दुःख के लिए ही दौड़ता-फिरता है