Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 24, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
इन्द्रियाणि निकृन्तन्ति न जाने किं भविष्यति ।
शास्त्रदृष्टिरपि प्राज्ञैर्नाश्रिता तरणाय या ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
सेवादि के द्वारा वश में लाये गये प्राज्ञो या अन्यान्य उपायों से
भने भवसागर तैर जाने के लिए जिस शास्त्रदृष्टि का आश्रय नहीं किया, वह शास्त्रदृष्टि भी वासना
में आसक्त करानेवाली होकर दृष्टिविघात की नाई मुझे अन्धा बनाने के लिए ही है