Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 25, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
वासनावेशवलिताः कुविकारशतात्मभिः ।
व्रजन्त्यधोधो धावन्तं शिलाः शैलच्युता इव ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जब ऐसी ही स्थिति है, तब आत्मवादी लोग एक दूसरे के विरुद्ध तरह-तरह के आत्मा के
स्वरुप क्यो मानते हैं; इस पर कहते हैं ।
सैकड़ों कुत्सित विकारों से, वासनाओं से तथा अभिमानो से भरे लोग बाहयदृष्टियों से ही आत्मतत्त्व
की समीक्षा करते-करते ऐसे नीचे-से-नीचे की ओर दौड़ते हुए जाते हैं जैसे पर्वत से च्युत हुई पाषाण
शिला नीचे से नीचे की ओर दौड़ती हुई जाती है