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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । संसारमार्गगहने पतितस्यापतन्ति हि । वृत्तवृत्तान्तलक्षाणि कीटा इव घनागमे ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

लाखों बातें आती-रहती हैं